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बड़हिया में 1949 ई० में स्थापित न्यास पर्षद से जुरे कुछ सवाल, आखिर क्यों?

बड़हिया के एक विभूति एक रत्न, समाज के गौरव स्व० रामाश्रय बाबू जी ने अपनी कीर्तियों की सुरक्षा के लिए बड़हिया में न्यास स्थापित किये थे उसके बारे में आज मैं क्षेत्र लोगों से जानना चाहूँगा की इस न्यास पर्षद का जो कार्य था जिस कार्य के लिए स्व० रामाश्रय बाबू जी ने इस न्यास की स्थापना की थी क्या उसका 10% कार्य भी आज इस न्यास की तरफ से हो रहा है अगर नहीं तो क्यों?

न्यास का परिचय निम्नुसार है:-

(1) श्री ठाकुरजी नृत्य राघवजी महाराज न्यास पर्षद. न्यास स्थापना सन 1949 ई०.

न्यासधारी (तत्कालीन) :-

1- स्वयं (रामाश्रय बाबू)
2 – श्री गणपत दास जी
3- श्री नीलकंठ प्रसाद सिंह
4- श्री रामरिझन सिंह
5- श्री विश्वनाथ सिंह
6- श्री अखिलेश्वर प्रसाद सिंह
7- श्री अविनाश चन्द्र शर्मा (बब्बन बाबू)
8- श्री धीरज प्रसाद सिंह
9- श्री रामावतार सिंह

इस न्यास पर्षद के अधीन:-
(1) बड़हिया स्थित श्री ठाकुर नृत्य राघवजी महाराज का मंदिर एवम संपत्ति
(2) देवघर स्थित श्री शंकर धर्मशाला
(3) अयोध्या स्थित श्री रामबल्लाभानिकुंज
(4) श्री नृत्य राघवजी पुस्तकालय बड़हिया का संचालन.

प्रश्न:- रामाश्रय बाबू की मृत्यु के बाद इस न्यास पर्षद के जो 4 प्रमुख धरोहर थी शायद उसे न्यास के सदस्य भूल गए आज यह मंजर है की (4) श्री नृत्य राघवजी पुस्तकालय सदा सदा के लिए मृत हो चूका हैं यह पुस्तकालय को बंद हुए 30 वर्षों से अधिक हो गए पर क्यों?

(2) देवघर स्थित श्री शंकर धर्मशाला भी मृत होने के कगार पर हैं श्री शंकर धर्मशाला में दशकों से रंगाई-पुताई तक नहीं हुई और धर्मशाला की छतें और दीवारें जर्जर हो चुकी है और शायद कभी भी गिर सकती है आखिर ऐसा क्यों आखिर न्यास और उसके सदस्य क्या कर रहें हैं? और न्यास हैं तो आखिर इसका पैसा हर वर्ष कंहा जा रहा है कंहा खर्च हो रहा है?

उनलोगों ने सिर्फ न्यास को ही नहीं भुलाया बल्कि मैं समझता हूँ अपने पूर्वज और बड़हिया के एक दिव्य व्यक्ति को भी साथ में भुला दिया हैं जों बहुमुखी प्रतिभावान थे, दानशील थे, जानशील थे, एक संगीतज्ञ थे, एक श्रेष्ठ पहलवान थे, आश्रयदाता थे, शांति सन्देश थे, समाज सेवी थे, पशु पालक थे, एक श्रेष्ठ साधक थे, सबों के उत्तम मित्र थे, स्नेहशील थे, दिव्य व्यक्ति थे, धर्म प्रचारक थे, एक आदर्श थे, लोगों के जीवन दीप भी थे क्या उनकी इक्षाओं के अनुसार आज उनके पारिवारिक लोग और निजी लोग जिसे उन्होंने न्यास का जिम्मा सौंपा था क्या वह आज अपने पूर्वज की एक भी इक्षा पूरी करने में असमर्थ हैं? जिन रामाश्रय बाबू जी लोगों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करते रहे जो समाज के गौरव थे उनकी मृतयु के बाद उनका इस प्रकार अनादर क्यों? क्या किसी के पास जवाब है इसका तो बताइए आखिर ऐसा क्यों?

सौरव कुमार:-
(एडमिन- बड़हिया.डॉट.कॉम)

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